जन्माष्टमी की कहानी !!
बहुत समय पहले मथुरा में कंस नाम का एक राजा था जो अपने लालच और अनुचित शासन के लिए बदनाम था
उसकी बहन 'देवकी' और 'वासुदेव' की शादी के बाद, ऊपर से एक भविष्यवाणी हुई,
"कंस !! तेरे अत्याचारों का अंत होने जा रहा है। देवकी और वासुदेव का 8वां पुत्र तुझे मार डालेगा"।
इस से कंस चिढ़ गया और उसने नव वर-वधू को कैद कर लिया। कंस ने देवकी के 7 बच्चों को मार दिया।
जब उन्होंने अपने 8वें बच्चे को जन्म दिया तो फिर से भविष्यवाणी हुई और कहा गया,
"अपने बच्चे को यमुना नदी के पार गोकुल ले जाओ और अपने दोस्त 'नंद' और 'यशोदा' की नवजन्मी बेटी के साथ बदल दो।"
वासुदेव ने नीचे देखा तो पता चला कि उनके हाथ बेड़ीमुक्त हो चुके थे। उन्होंने जल्दी से अपने बच्चे को उठाया और उसे एक टोकरी में डाल दिया, जेल के दरवाज़े खुले हुए थे
और सारे पहरेदार गहरी नींद में सो रहे थे। बाहर बहुत तेज़ बारिश हो रही थी
और तूफ़ान भी आया हुआ था। जैसे ही वह तूफानी नदी में उतरे, उनके सिर पर टोकरी थी,
पानी कभी भी उनके कंधों से ऊपर नहीं उठा। एक दस सिर वाला सांप बच्चे को घनघोर बारिश से बचाने के लिए आ गया था।
वासुदेव को अब तक एहसास हो गया था कि उनका बच्चा एक दिव्य-शक्ति है।
नंद के घर पर वासुदेव बच्चों को बदल कर वापस जेल लौट गए।
जब पहुंचे तो कंस ने उस बच्चे को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की।
तो बच्ची ने देवी दुर्गा का रूप धारण कर लिया और कहा
कि "8वां बच्चा जो तेरे आतंक को खत्म करने जा रहा है, उसका जन्म हुआ है और वह अपनी भविष्यवाणी को पूरा करेगा।"
बच्चे कृष्ण को यशोदा ने पाला और बाद में उन्होने ही कंस को मारा।
और इसलिए, हर साल हम कृष्ण के जन्म का पर्व मनाते हैं,
जिसे पूरे भारत में जन्माष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।
जन्माष्टमी की तैयारी !!
मैंने स्कूल से आते ही बस्ता फेंका और सीधा नीचे दोस्तों के साथ खेलने चला गया।
कल से दो दिन की छट्टी थी। जन्माष्टमी जो आ रही थी। हम सभी दोस्त अपने खेल कूद में व्यस्त थे।
तभी हमारे ही ब्लॉक के कुछ बड़े लड़के आये और मुझसे पुछा, "अरे मनु, सुनो, क्या तुम जन्माष्टमी मुझे कोई किरदार निभाना चाहोगे ?"
मेरी आँखें खुशी से बड़ी हो गई। मैंने तुरंत हां कह दिया। मैंने बाद में पुछा, "भैया !!, कोन सा किरदार मिलेगा मुझे निभाने के लिये ?"
जवाब मिला कि अभी तक कुछ निर्णय नहीं हुआ है। कल शाम तक बता देंगे।
मैंने अपना खेल समाप्त किया और घर आकर, सबको बताया की इस बार मैं भी कुछ बनूँगा जन्माष्टमी में।
अगले दिन मुझे बताया गया की मैं 'भगवान विष्णु' का किरदार निभा रहा हूं। मुझे बहुत खुशी हुई।
अब तो बस कल का इंतेजार था। अगले दिन सुबह से ही तंबू लगना शुरू हो गया था।
सभी बच्चे वहां हल्ला-गुल्ला मचा रहे थे और साथ ही काम में हाथ भी बंटा रहे थे।
पंडाल के ठीक सामने, 'शिव जी' के बैठने का स्थान बनाया जा रहा था। कपड़ो की चादर से पहाड़ बनाये जा रहे थे।
उनकी चोटियां बनाने के लिये उनके नीचे लकड़ियां लगाई जा रही थी।
फिर पीछे की तरफ टेबल से भी समर्थन दिया गया था। पहाड़ बन जाने के बाद उस पर नीले और सफ़ेद रंग से रंग किया गया।
जन्माष्टमी की तैयारी !!
अब बहुत अच्छा दिख रहा था सब। वहीं दूसरी तरफ फलो और फूलों को एकत्रित किया जा रहा था।
जिसमे पानी भरा गया था, और फिर बीच में 'वासुदेव जी' की प्रतीमा स्थापित की गई थी,
जो की सिर पर एक टोकरी में छोटे कृष्ण जी को उठाये हुए। विष्णु जी को लेटे हुए दिखाना था,
तो उनके लिए एक तख्ता लगाया जा रहा था, और उस पर साज-सज्जा की जा रही थी।
जहां राधा कृष्ण जी को खड़े रहना था, वहां की भी साज-सज्जा की जा रही थी। मैं बड़ा ही प्रसन्न था।
सब जगह हलचल मची हुई थी। शाम होते-होते, सजावटी रोशनी का भी प्रभंध हो गया था।
सभी किरदारों का स्थान तैयार था। मैं अपने घर आ गया था, तैयार होने के लिए।
जन्माष्टमी की तैयारी !!
नहाने के बाद मैंने धोती पहनी और अपनी बड़ी बहन के कुछ सजावटी आभूषण पहने और तैयार हो गया।
जब पंडाल में पहुंचा तो वहां पड़ोस की ही एक लड़की सभी को तैयार होने में मदद कर रही थी।
उनका नाम मीनू था। उन्होंने मुझे भी बुलाया और थोड़ा मेकअप किया।
होटों पर लिपस्टिक लगाई और चेहरे पर थोड़ा पाउडर लगा दिया। अब मैं एक-दम तैयार था। सबने तारीफ करी।
इतने में वो लड़का भागता हुआ आया, जो 'शिव जी' का किरदार निभा रहा था और
उसने कहा, "अरे !! कोई इन मच्छरों का भी इलाज करो भाई, वहां बहुत मच्छर काट रहे हैं।"
फिर वहां एक मच्छर भगाने वाली अगरबती लगाई गई। सभी किरदार तैयार थे, तभी
किसी ने कहा, "अरे 'विष्णु जी' को अकले थोड़े ही बैठना है। 'लक्ष्मी जी' भी होनी चाहिए साथ में। "
इस बात पर तो किसी का ध्यान ही नही गया था अब तक।
जन्माष्टमी की तैयारी !!
अब अंतिम क्षणों में एक और किरदार कहां से लाते।
तभी एक दुबला पतला लड़का जिसका नाम राजू था वो पंडाल में आया,
उसके हाथ में फूल, अगरबत्ती और पूजा का सामान था। अब सभी की नज़र राजू पर गई।
उससे पुछा गया, की क्या वो लक्ष्मी जी का किरदार निभाएगा। उसने तभी हाँ कर दी।
चलो अब उसे बस तैयार करना था। राजू को साड़ी पहनाई गई, गहने पहनाये गए।
वो अपने किरदार के अनुरूप ही दिखाई देने लगा था। सभी तयारी हो गई थी।
जो राधा कृष्ण का किरदार निभा रहे थे। वो दोनों बहुत सुंदर लग रहे थे।
पंडाल खोलने का समय हो चुका था। दर्शन करने वालों ने पहले ही बहुत लम्बी लाइन लगा रखी थी।
पंडाल खुलते ही भक्त आने लगे। कोई कोई भक्त मेरे आगे नतमस्तक हो जाते थे।
वो मुझमे साक्षात विष्णु भगवान ही देख रहे थे शायद !! ये पल बहुत सुंदर और भक्तिमय थे।
कब समय बीता पता ही नही चला। रात के 12 बजे 'कृष्ण जी' के जन्म को सबने खूब जोर-शोर से मनाया।
प्रसाद बांटा गया। और हल्की बारिश भी हुई। और इस तरह भगवान 'श्री कृष्ण जी' के जन्मोत्सव को हमने मनाया।
जय 'श्री कृष्ण' !!!!


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