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दशहरे की रौनक
आज दशहरा है, मेरे घर के ठीक सामने वाली गली में बच्चों ने रावण का एक पुतला बना लिया था, और उसे अब एक खाली पड़े प्लॉट में लगाया जा रहा है। बच्चों का पुरा झुंड उमड़ पड़ा है, सभी बराबर मेहनत कर रहे हैं।
साथ ही साथ ही साथ कुछ पडोसी अंकल और आंटी भी मदद के लिए आ गए हैं। अब काम में थोड़ी तेजी आई है। पुतला भी बन कर तैयार हो गया है। बस अब तो शाम होने का इंतज़ार हो रहा है।
धीरे धीरे मौसम में ठण्डक होती जा रही है, खिड़की से आती धूप अब सुनहरी हो चली है। छत से लटकता पंखा, धीरे-धीरे चलते हुए जैसे आने वाली ठंड का पूर्वभास दे रहा हो।
धूप अब सिमटने लगी है। शाम की ललीमा आसमान पर छाने लगी है। अब शाम हो चली है। शाम कुछ जल्दी ही होने लगी है। बच्चों का शोर बहार से आने लगा है। सभी तरह से चहल पहल हो चली है। सब तैयार होकर, रावण के पुतले के पास जुटने लगे।
बहुत शोर गुल हो रहा है। बीच बीच में कोई पटाखा जला देता है और मानो सबको लगता है कि रावण दहन हो रहा है। अभी शाम के 8 बजे हैं और रावण दहन का कार्यक्रम शुरू हो चला था।
थोड़ी बहुत आतिश बाजी के बाद, रावण दहन का कार्यक्रम शुरू हो गया और उसकी गरमी से पास खड़े लोग पीछे होने लगे।
खूब हल्ला गुल्ला हो रहा था। पटाखे फूटने लगे। बच्चे तालियां बजाकर और बड़े चुप चाप चेहरे पर एक मुस्कान लिए उस्तव का आनंद ले रहे थे कुछ समय के लिए सब जगह रोशनी हो चली थी। पास ही में एक चाट वाला, गुब्बारे वाला, बच्चों के खिलौने वाला और आइसक्रीम वाला भी आ गए थे।
लोग अपने मन पसंद व्यंजन का आनंद ले रहे थे। 10 या 15 मिनट बाद कार्यक्रम संपन्न हुआ। बच्चे बड़े सभी आनंद ले रहे थे। समय बीतने के साथ सभी अपने घर जाने लगे।
छोटे बच्चों ने नई नई पोशाक पहनी हुई थी। सभी के चेहरे खिले हुए थे। और इसी के साथ अब जैसे आने वाली दीपावली का इंतजार शुरू हो चला था। मौसम की हल्की हल्की ठण्ड जैसे एक सिहरन सी पैदा कर रही थी। बीच बीच में कहीं से पटाखों की आवाज सुनाई दे जाती।
इस तरह एक पर्व संपन्न हुआ और एक का इंतजार शुरू हुआ।
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