Hindi Kahani - समय का चक्र !!
सुबह सुबह मैं उठा और रोज़ की तरह अपनी छत पर घूमने गया। घूमते-घूमते मेरी नज़र एक चौकोर से लोहे की वस्तु पर पड़ी।
ये पहले तो यहां पर नहीं थी। मैंने उसे उठाया और देखा। शायद ये पड़ोस के किसी बच्चे ने हमारी छत पर फेंक दिया होगा।
बहुत पुराना सा कुछ था। देखने मे वो कलर मैच करने वाली क्यूब (रूबिक क्यूब) जैसा कुछ लग रहा था।
मैंने ऐसे ही उसे इधर उधर घुमा कर देखा और अपने साथ अपने कमरे में ले आया।
मैंने उसे वहीं बगल में रख दिया। अगर किसी बच्चे का होगा तो बाद में आकर ले जायेगा।
फिर मैं अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया।
रात को मैं अपने कमरे में सोने आया और फिर एक बार उस अजीब चीज़ को देखा।
मन ही मन हंसा और थोड़ा इधर उधर घुमा कर देखने लगा। उस पर कुछ संख्याएं लिखी हुयी थी।
फिर उसे मैंने अपने पलंग के सिरहाने रखा, और सोने की तैयारी करने लगा। "सामान्य रहा आज सब"।
लेटे लेटे अपने कुछ पुराने सुनहरे दिन याद कर रहा था। सोचते सोचते कब आंख लग गई, पता ही ना चला।
Hindi Kahani - समय का चक्र !!
सुबह मेरी नींद, मेरी मम्मी की आवाज़ से खुली। "मनु, कब तक सोयगा, उठ जा, स्कूल नहीं जाना"।
मैं जैसे कोई सपना देख रहा हूँ। मैं उठा, और सामने अपनी मम्मी को देखा।
मैंने अपने आप को देखा, आस पास सब कुछ बदल गया था। वाह !! क्या सपना है।
मैंने ज़ोर से अपने आप को एक चींटी काटी। अरे नही, ये तो सच है। मैंने कैलेंडर में साल देखा। ये 1997 था।
मेरा दिमाग़ चकरा गया। ये कैसे हो सकता था। ये सब झूठ है।
कुछ समय बाद मैंने पाया, की ये सब सच में हो रहा था। मैं, ना जाने कैसे साल 1997 में पहुँच गया था।
मुझे कुछ समय लगा अपने माहौल के अनुकूल होने में।
फिर मैं मारे खुशी के उछल पड़ा। सीधा जा कर, मम्मी से लिपट गया। घर में सभी से मिला।
बहुत सुकून मिल रहा था। जैस सालों से प्यासे को पानी नसीब हो गया हो।
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Hindi Kahani - समय का चक्र !!
नाश्ता करने में क्या आनंद आ रहा था। हवा में एक अलग ही खुशबू थी। मौसम सुहाना था।
मैंने अपने स्कूल जाने की तैयारी शूरू की।आज पहली बार स्कूल जाने में इतना मज़ा आ रहा था। सारा रास्ता मुझे अब भी ज्यों का त्यों याद था।
स्कूल जाके सभी पुराने दोस्तों से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई। अपने शिक्षकों से मिलकर इतनी ख़ुशी कभी नही हुई थी।
स्कूल में एक-एक पल खूब मज़े किये। मैंने अपना होम-वर्क भी पुरा किया
और हाथों पर बॉल-पेन के ढ़ेर सारे निशान भी पड़ गये। जो अक्सर आ ही जाया करते थे।
फिर में अपने कॉलोनी के दोस्तों से मिला और खूब खेला। दिन कब ढला, पता ही नही चला।
ढलती शाम को मैं अपनी छत पर जाकर देखा करता था। वही अब भी किया मैंने।
डूबता सूरज कितना सुंदर लग रहा था। मेरे चेहरे पर मस्कुराहट थी। सब कुछ समेट लेना चाहता था मैं।
रात होती गयी। मैं घर वापस आया। मम्मी के हाथ का बना खाना खाने को मिला। मैं कैसे बयां करूँ उस एहसास को।
दुनिया के सारे ऐशो-आराम कम पड़ जाएं इस एहसास के आगे।
Hindi Kahani - समय का चक्र !!
आज मेरे पास ना मेरा मोबाइल था, ना पैसे था, ना बड़ा घर था,
ना कोई गाड़ी थी, लेकिन खुशी अनंत थी।
चेहरे की मुस्कराहट जैसे जाने का नाम ही नही ले रही थी। शायद ये ही है असली खुशी, सुकून।
आधी रात तक तो मुझे नींद नही आयी। फिर कुछ समय बाद आप नींद आती चली गई।
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इतनी गहरी और सुकून भरी नींद मैं ना जाने पहले कब सोया था। सुबह के उगते सूरज ने मेरी आखों को उठने का इशारा किया।
मैं उठा तो फिर एक आश्चर्य मेरा इंतेज़ार कर रहा था। मैं वापस अपने वर्तमान में आ गया था।
जैसे कुछ हुआ ही ना हो। मुझे लगा की ये एक सपना ही था। लेकिन फिर मेरी नज़र अपने हाथों पर गई।
जिन पर अब भी बॉल पेन की सियाही लगी हुई थी। जो की स्कूल का काम करते हुए लग गई थी।
फिर मुझे लगा, हो ना हो, ये "समय का चक्र" उसी लोहे के चौकोर टुकड़े की वजह से हुआ है। मैंने उसे ढूंढा।
लेकिन वो मुझे नही मिला। जाने वो कहाँ गायब हो गया था।

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