Hindi Kahani - एक अच्छा मित्र !!
मैं रेलवे की परीक्षा देने प्रयागराज जाने की तयारी कर रहा था।
सब सामान अपने बैग में रखता जा रहा था।
घर वाले सब, क्या क्या साथ में ले जाना है, ये याद दिलाते जा रहे थे।
फलस्वरूप मेरी पैकिंग अब पूरी हो गई थी। अगली रात को मुझे दिल्ली से अपनी ट्रेन पकड़नी थी।
मैंने अपना टिकट चेक किया और सोने चला गया। मैं 2 दिन पहले ही प्रयागराज पहुंचना चाहता था।
ताकी थोड़ी तैयारी कर लूँ और एक दिन पहले जाकर अपना परीक्षा केंद्र भी देख सकूँ।
मैंने दिल्ली से अपनी ट्रेन निर्धारित समय पर पकड़ी।
बहुत मुश्किल से एक सीट खाली मिली और मैंने जैसे-तैसे अपना सफर पूरा किया।
स्टेशन पर उतरकर मैंने सबसे पहले एक अच्छे से होटल की तलाश शुरू की।
मैंने स्टेशन के आस पास लगभग सभी होटल वालो से पूछ लिया था, लेकिन कोई भी होटल खाली ना मिला।
परीक्षा के कारण सभी होटल भरे हुए थे। थक हार कार मैंने एक मेज़ पर थोड़ा आराम करने की सोची।
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मुश्किल से अभी 10 मिनट ही हुए की एक नौजवान मेरे पास आया।
उसकी आयु लगभग 20-22 वर्ष रही होगी, 6 फीट के करीब लंबा कद और ह्रिश्ट-पुश्ट शरीर।
चहरा दमक रहा था उसका। सफेद सिल्क का कुर्ता पायजामा पहने वो सीधा मेरे सामने खड़ा हो गया।
मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने पुछा, " कुछ काम है आपको ?"। उसने मस्कुराकर उत्तर दिया, "आप होटल में कमरा ढूंढ रहे है क्या?" मैंने तुरंत हाँ में जवाब दिया।
उस अपरिचित ने पहले अपना परिचय दिया और कहा, मेरा नाम विशम्भर दयाल है।
इतना सुनते ही मैंने बिना सोचे-समझे कह दिया, "इतना पुराना नाम कौन रखता है" ।
और फिर हम दोनों ही हंस पड़े।
बातें करते करते हम नज़दीक ही एक होटल तक आ गए
और मैंने कहा, "अगर मैं तुम्हे विशु कहूं तो कोई हर्ज नहीं।
उसने कहा, " जैसा आपको सहज लगे "। विशु का हिंदी का ज्ञान बहुत अच्छा था,
साथ ही साथ उसकी बोलचाल की हिंदी भी बेहद ही शुद्ध जान पड़ती थी।
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होटल पहुंचकर विशु ने मुझे कहा, "काउंटर से कमरा नंबर 208 की चाबी मांगना
और कहना की आपको पहले से पता है की वो रूम खाली है"।
और साथ ही हिदायत भी दी की उसका नाम मैं काउंटर पर ना लूँ ,
क्युकी ये जमीन उनकी ज़रूर है लेकिन होटल उनका नही है।
वो होटल के मामले में दखल नहीं देता। मुझे भी सही लगा और जैसा बोला गया, वही किया।
काउंटर पर बैठे बाबू ने चश्मा नीचे करते हुए कहा, "आपको किसने कहा, 208 खाली है ?" मैंने कहा आप बस रूम की चाबी दीजिये और सब छोड़िये।
वो आगे जैसे ही कुछ बोलने लगा, मैंने उसे चुप रहने को कहा और कमरे में सामान पहुंचा देने की हिदायत दी।
अब वो मेरी बात मान गया। अपने कमरे मे आकर मैंने थोडा आराम किया।
थोडी देर बाद ही मेरे कमरे की घंटी बजी। सामने विशु खड़ा था, वो मुस्कुराते हुए बोला, "चलो तुम्हारा परीक्षा केंद्र देख आएं"।
वो मेरी पूरी मदद कर रहा था। हम दोनों में कुछ ही समय में अच्छी मित्रता हो गई थी।
केंद्र देखने के बाद विशु बोला, "चलो तुम्हे यहां की मशहूर कचौरी खिलाते है"। और हम चल दिये।
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मैंने दो प्लेट कचौरी के लिए बोला तो विशु ने कहा, "आप खाओ,
ये तो हमारा शहर है, हम कभी भी खा लेंगे"।
मैंने दुकानदार से 2 प्लेट का आदेश रद्द करवाया और 1 ही प्लेट ली।
वहां खड़े सभी लोग मुझे अजीब ढंग से देखने लगे, मानो मैं कोई पागल हूँ।
खैर, मैंने कुछ और मशहूर चीज़ें खाई। हर बार विशु ने मना ही किया,
और कहा, "आप हमारे मेहमान हो, आप खाओ"। दिन भर घुमकर हम होटल पहुंचे। विशु भी साथ था।
कल परीक्षा थी, 11 बजे तक हमने बात करी और फिर वो चला गया। मैंने भी सुबह की परीक्षा की तैयारी करी और सो गया।
सुबह-सुबह ही मेरे कमरे की घंटी बजी। देखा तो विशु खड़ा मस्कुरा रहा था। वो बोला, " उठो मनु जी, आज परीक्षा है आपकी "।
मानो मुझसे ज़्यादा उसे मेरी परीक्षा की चिंता हो। मैंने उसे अंदर बुलाया और 2 लोगों का नाश्ता मंगवाया।
विशु ने कहा, "तुम ही खाओ, मैं तो पेट भर खाकर आया हूँ, और ज़रा जल्दी करो। फिर मैं भी जल्दी से तैयार हुआ और
बाहर आकर रिक्शा का इंतज़ार करने लागा।
थोड़ी देर बाद हम परीक्षा केंद्र पहुंचे और मैं अपनी तैयारिओं में लग गया।
जब मैं परीक्षा देकर बाहर आया, तब भी विशु वहीँ पेड़ के नीचे बैठा मेरा इंतेजार कर रहा था।
उसका सिल्क का कुर्ता धूप में उसी की भांति चमक रहा था। मैंने कहा, "अरे विशु तुम घर नही गए "। वो जवाब में बस मस्कुरा भर दिया।
फिर हम साथ ही होटल आये। अगले दिन मैं वापस दिल्ली जाने के लिए समान पैक किया और चल दिया।
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मैंने काउंटर पर बिल पुछा और पैसे दे दिए। काउंटर बाबू ने पुछा, "साहब कोई तकलीफ तो नहीं हुयी ना ?" मैंने तुरंत जवाब दिया, "विशु के होते कैसी तकलीफ भाई" ।
काउंटर बाबू ने हंस कर कहा, " कौन विशु साहब ? हमारे यहां कोई विशु काम नही करता" । मैंने कहा, ओह! क्षमा करना, विशम्भर दयाल.
बाबू ने नाम पहले कभी सुना ही नही था। वो मुह बनाते हुए बोला, " कौन विशम्भर साहब?"
मैंने कहा, "वो ही लड़का, जो हमेशा मेरे साथ ही होटल में आया करता था और
आज भी साथ ही आया था "। वो बड़े आश्चर्य से बोला, "क्या बोल रहे हो साहब जी।
आप तो हमेशा अकेले ही आया करते, और ना जाने क्या बड़बड़ाते रहते थे "। अब मुझे थोडा गुस्सा आया,
मैंने कहा, " दिखाओ आज दोपहर का सीसीटीवी फुटेज, जो तुम्हारे डेस्क के उपर लगा है "।
वो बोला "अभी लो साहब"। मेरे आश्चार्य का कोई ठिकाना ना रहा,
जब मैंने देखा की मैं अकेले ही होटल में आया था। मेरे साथ कोई ना था। विशु तो फुटेज में कहीं भी दिखाई ही नहीं दे रहा था।
मैं सन्न रह गया।
काउंटर बाबू ने कहा, " तभी तो किसी को कमरा नंबर 208 नहीं देते,
आप ही जिद कर रहे थे वहां रुकने की। जो भी वहां रुकता है, ऐसी ही अजीब बातें करने लगता है "।
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मेरे पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई। मैं ही जानता था वो सब सत्य था।
फिर अभी मुझे समझ में आया, क्यों विशु ने कहीं भी मेरे साथ कुछ नही खाया।
क्यों वो हमेशा एक ही जोड़ी सिल्क का कुर्ता पहनता था।
क्यूं लोग मुझे अजीब नज़रों से देखा करते, जब मैं 2 लोगो का खाना ऑर्डर करता था।
मैंने काउंटर बाबू को और कुछ ना कहा और सीधा दिल्ली वापस आ गया।
सच कहूं तो मुझे कहीं भी, कभी भी डर का एहसास तक नहीं हुआ। हाँ थोड़ा आश्चर्य ज़रूर हुआ।
एक दोस्त ने मेरी, एक अजनबी शहर मैं बहोत मदद करी। वास्तव मे वो मेरा एक अच्छा मित्र था।
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