आलस्य का आनंद !! - Hindi Kahani - मनु की कहानियां !!

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शुक्रवार, 12 जून 2020

आलस्य का आनंद !!


सुबह  की धूप ने खिड़की से आकर  मेरी प्यारी नींद  को भगा दिया था। मैंने  अपनी चादर को थोडा और खींचा और चेहरा ढक कर फ़िर से सोने  की कोशिश करने  लगा। अब इस खींचा-तानी में, पैरों से चादर हट गई और एक, दो मच्छरों ने सुबह का नाश्ता  कर लिया। मुझे इसकी तनिक भी परवाह ना थी। आ हाय ! ये थोड़े समय  की अतिरिक्त  नींद, जैसे  किसी उपहार से कम ना थी। परन्तु  दुष्मन अलार्म ने  बजकार ये  बता  दिया, की ऑफिस जाने  का समय  हो चला है। बेमन से उठकर  नाश्ता बनाया, फिर ऑफिस  के लिये तैयार हो गया।

थोड़ी ज़्यादा  नींद पाने  के लिये, नहाना  रद्द हो गया था। आज मैंने  3 अच्छे  काम किये, 1- पानी बचाया, 2- थोडा अधिक सोया और 3 - अगले दिन  एक बाल्टी कम भरनी पड़ेगी। अब बड़े  ही  बेमन से  ऑफिस की तरफ चल दिए। जिस प्रकार, पानी में खड़े  ब्राह्मण ने अपनी पूरी रात एक दीपक को देख कर गुजार दी थी (संदर्भ: कहानी "बीरबल की खिचड़ी"),  ठीक उसी प्रकार मैंने भी पूरा हफ़्ता इतवार  की छुट्टी को इंतेज़ार करते  हुए बिताया।

अब आ गया था आराम करने का दिन। पूरे सप्ताह मैंने  एक भरपूर नींद पाने  की लालसा रखी थी, जो अब पूरी होने वाली थी। रविवार का दिन कितना  सुकून लाता है। आज तो  अलार्म  को भी आराम मिल जाता  है। वाह! देर  से उठने  का क्या अलग ही आनंद है, चाहे पलंग पर लेटे-लेटे, कितनी ही भूख लग जाय, परन्तु आज तो नींद की ही  विजय होगी।

खाना तो रोज़ ही  खाते हैं। लगभग  दोपहर  को जब दीवार पर लगी घड़ी  उठने का इशारा करती है तब थोड़ी और देर वहीँ पलंग पर  बैठे रहने का अलग ही आनंद है। आज तो नहाने  का कोई मतलब ही  नहीं  होता। लेकिन हर छुट्टी  के दिन  एक बड़ा ही द्वन्द  उत्त्पन्न हो जाता  है। नाश्ते  और दोपहर  के खाने की बीच। 

देर  से उठने  पर, क्या खाया जाय, नाश्ता  या सीधा  दोपहर  का खाना, बस ये ही  समझ नहीं आता। कुछ खाने  के बाद  जो दोबारा नींद  आती है, उसकी कोई तुलना ही नहीं है। क्या सुकून है। अब  शाम हो चली है। अब आखों से नींद पूरी तरह ग़ायब हो गई है, एक अनचाहे  डर से की कल सोमवार है, दिल जैसे बैठा जा रहा है। सोते-सोते बहुत देर  हो गई और अगले दिन फ़िर  वही पानी बचाने  की कहानी शुरू।


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