बुधवार का दिन था, अभी कुछ और दिन ऑफिस जाना है, ये सोचकर पलंग से उठा ही नही जा रहा था। जाने क्या जादू है, ऑफिस जाने के नाम से और नींद आने लग जाती है। अब उठना तो था ही, तो थोड़ा समय और पलंग पर इधर उधर होते हुए बिताया और फिर उठ कर बैठ गया। सुबह से ही सूर्यदेव क्रोध में नज़र आ रहे थे। भरपूर गरमी शूरू हो गई थी। अब तो बस एक बाल्टी ठंडा-ठंडा पानी ही राहत दे सकता था।
बिना समय गवाएं मैं सीधा नहाने चला गया। ज्यों ही पानी के लिये नल खोला, पता चला, आज तो पानी चला गया है। मुझे उठने में देर हो गई थी और पानी का समय निकल गया था। हमारे यहाँ सुबह 5 से 6 बजे तक ही पानी आता था। नहाने का छोड़ो, पीने का भी बहुत कम पानी बचा था।
मुझे उसी समय, पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी की याद आयी, मैं तुरंत पानी की एक बाल्टी लेकर, एक याचक की भाँती पहुंच गया। मैंने पाया की उनके घर के बाहर लगे नल में अभी भी पानी आ रहा था, जाने कैसे। मैंने शर्मा जी को अवाज दी, लेकिन कोई उत्तर ना आया। अब मैंने समय नही गंवाया और तुरंट ही अपनी बाल्टी नल के नीचे रख दी। बाल्टी भरने ही वाली थी की शर्मा जी की बीवी आ गयी, और उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे एक पुलिस वाला अपराधी को देखता है। उनके पीछे चमकता सूर्य उनको और विकराल दिखा रहा था। मैंने ज्यों ही कुछ कहना चाहा, वो मुझ पर बरस पड़ी। गरमी की वजह से मैं कुछ सुनने की हालत में ना था। मैं तो उनके विकराल रूप को देखता रहा बस । जब वो शांत हुई तो मैंने मुस्कुराते हुए सारी बात कह डाली, और एक बाल्टी पानी जैसे-तैसे लेकर आया।
आधी बाल्टी से नहाया और आधी पीने के लिये बचाकर रख दी। अब तक सारा आलस्य भाग चुका था और ये सोचते सोचते ऑफिस की ओर बढ़ चला की ऐसी गर्मी, सर्दियों में कहाँ मिलेगी। इसका भी आनंद उठा लिया जाय।

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