सुबह उठते ही पान खाने की जबरदस्त इच्छा हो उठी। हम भी सीधा घर के सामने स्तिथ पान की दुकान पर गये और अपना रोज़ वाला पान बनाने को कहा। पान वाला हमे जानता था, तो उसने तुरंत ही हमे पान थमा दिया। अब पान खाके जो आनंद आया है, उसका जवाब नही। आस पड़ोस वाले, सभी हमे जानते थे, कोई डर नही था। कहीं भी पान की पीक मार दीया करते थे। पड़ोस वाले शर्मा जी वहीं रास्ते में मिल गये और हाथ जोडकर नमस्ते करते हुए हाल चाल पुछा, "और मिश्रा जी, सुबह का पान खा लिया आपने ?" हमने भी हसकर सिर हिला दीया और चलते बने। अभी अभी तो पान खाया था, ज़्यादा बात करने की हमारी तनिक भी इच्छा ना थी।
अब तैयार होकर कार्यालय के लिये चल दिये और 8, 10 पान भी साथ में रख लिए, पुरे दिन के लिए। रास्ते में एक जगह लिखा पाया, "थूकने पर 500 रूपए का जुरमाना"। हम भी पढ़े-लिखे थे भाई, हमने वहां नही थूका और ज़रा आगे जाकर पान थूका। पढ़ाई लिखाई भी कुछ चीज़ होती है। लेकिन जो भी कहो, अब पहले जैसी निडरता से पान नही खाया जाता। जगह जगह लिखा होता है, " यहाँ ना थूकें "।
पान की पीक मारने के लिये सही जगह ढूँढना भी एक कला है। कार्यालय की सीढ़ियों में भी अब लिखा जा चुका था। अब 20 रूपए के पान के लिये 500 रूपए का जुरमाना तो अधिक है। अब इतना ध्यान तो रखना ही पड़ता है। कहीं भी कलाकारी दिखाने के ज़माने अब गए। दीवारों पर जो अलग अलग चित्र बने होते थे, अब कहाँ दिखते हैं।
चलो लोग अब पढ़े-लिखे हो गये है या फिर जुरमाने का डर ही सही। एक बार मैंने भी गलती से ऐसी जगह पान की पीक मार दी, जहां 200 रूपए जुरमाना लिखा था। मैंने आस पास देखा, कोई ना था, चलो किसी ने नही देखा। लेकिन मन ही मन बहुत बुरा लगा। किसी ने देखा या नही, लेकिन हमने तो देखा। मैंने वहीं 200 रूपए का प्रसाद, नज़दीकी मंदिर में चढ़ा दिया। मन से बोझ हल्का हो गया और थोड़ी जेब भी।
समझ आ गया था और आत्मग्लानि नही चहिये थी, इतना पैसा भी कहाँ था। दोनों ही कारणों से, हमने पान खाना अब छोड़ दिया था। और इस तरह, मुँह से पीक मारकर, पुरा चित्र बनाने की कला अब लुप्त हो गई।

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