गर्मियों से परेशान थे सब। बारिश के दिनों का बेस्बरी से इंतज़ार हो रहा था।
कभी बादल आते और बिना बरसे ही चले जाते और कभी बूंदा-बांदी होकर रह जाती।
अब तक जून का महीना खत्म होने लगा था और हवा में नमी बढ़ने लग गयी थी।
ये महीना खत्म होते होते बारिश भी शुरू हो गयी थी। मैंने एक बरसाती खरीद ली थी,
बारिश से बचने के लिये। बारिश का मौसम अब तक पुरी तरह आ चुका था।
मैं अक्सर दिल्ली में बने एक किले के पास से होकर कार्यालय जाया करता था।
रोज़ की तरह उस दिन भी मैं घर से अपनी साइकिल पर कार्यालय के लिये
निकल ही रहा था की तेज बारिश शुरू हो गई।
फिर भी मैंने कार्यालय जाने का फैसला किया, क्यूंकि अब तो लगभग पूरा दिन ही बारिश हो रही थी।
रास्ते में बारिश बहुत तेज़ हो गई। आगे कुछ भी देखना मुश्किल हो रहा था।
मैं कार्यालय का आधा रास्ता अब तक तय कर चुका था और वहां बीच में रुकने की कोई जगह भी नही थी।
मैं अब किले के पास आ चुका था । बरिश अब भी बहुत तेज हो रही थी। मेरा ध्यान सड़क पर ही था।
तभी मैंने एक व्यक्ति को तेज़ बारिश में सड़क पार करते हुए देखा। उसकी लम्बाई क़रीब-क़रीब 7 या 8 फीट रही होगी।
उसके पैर मानो थे ही नही। वो मानो हवा में तैर रहा था।
वो सड़क के एक किनारे से होता हुआ, सीधा उस किले की दीवार में समा गया।
मन आशंकाओं से भर गया था। सोच रहा था आगे जाऊँ या नहीं।
फिर डरते-डरते आगे बढ़ा और कार्यालय पहुंचकर ये किस्सा सबको सुनाया।
कहते हैं, उस किले में अक्सर कई रहस्मयी चीज़े पहले भी देखी जा चुकी हैं।
और कई लोग तो मानते हैं, वहां ऐसी अंजानी ताकत है जिनको छेड़ा नही जाना चाहिये।
मैंने वहाँ से आना जाना बंद कर दिया था अब। अगर कभी कार्यालय के लिये देर हो जाती,
तभी वो रास्ता चुनता लेकिन मन में एक डर हमेशा बना रहता, उस अजनबी साये का।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया Comment बॉक्स में किसी भी प्रकार के स्पैम लिंक दर्ज न करें।