तापमान 44 के पार जाने को बेचैन हो रहा था, सूर्यदेव जैस अपना क्रोध दिखा रहे थे , हवाएं भी गरम हो चली थी। दिल्ली का हाल बेहाल था। कूलर तो जैसे काम ही नही कर रहा था। जाने उसकी ठंडी हवा अब कहाँ चली गयी थी। सबमे एक राहत की बात थी, और वो थी "गर्मियों की छुट्टियां"। सुबह होते ही दोस्त घर के नीचे से आवाज़ देने लग जाते। पार्क में घूमने जाने से अपने दिन की शुरुआत होती।
घर आकर चाय-नाश्ता करने के बाद, दोस्तों की टोली फिर एक जुट हो जाती। आस-पड़ोस के सभी बच्चे जीने (सीढ़ियों) में इक्कट्ठा होते। उन दिनों, घर से ज़्यादा जीना ठंडा हुआ करता था। फिर जो कैरम बोर्ड, लूडो, व्यापार का खेल, गिट्टे (पांच पत्थरों का खेल), ट्रम्प कार्ड का खेल शूरू होता तो दोपहर तक चलता।
घर से डांट भी पड़ती थी तो थोड़ी देर पढाई भी कर लिया करते और फिर हाथों में कॉमिक्स लिये घंटो बैठे रहते। कॉमिक्स का जूनून तो ऐसा था, मानो कुछ रातों को तो नींद ही ना आये बिना कॉमिक्स पढ़े। जब भी कोई नयी कॉमिक्स आती तो मन पढ़ने को बेचैन हो उठता। उन दिनों की शाम बहुत सुहानी होती थी। सब इक्कठा होकर कुछ ना कुछ खेला करते। कभी छुपन-छुपाई , चोर-पुलिस, चेन, पिट्ठू। बहुत सरल खेल जिन्हे हम सब मिल्कर खेला करते थे।
रात होते-होते सब शांत होने लग जाता और घर वापस आकर बहुत ज़ोर से भूख लगने लग जाती। खाने के बाद बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ जाती और फिर सुबह फिर से वही दिनचर्या शूरू। आजकल वैसी गर्मी पड़ती ही नही शायद। बहुत याद आते है, वो गर्मियों के दिन .........

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