मैं एक मध्यम वर्गिय परिवार में जन्मा और पला-बढ़ा व्यक्ति था। एक सहकारी विभाग में मेरी नौकरी भी लग गई थी। सब कुछ सामान्य दिनचर्या के अनुसार चल ही रहा था कि एक दिन सब असामान्य हो गया, जब मेरी साइकिल मेरे ही घर के नीचे से गायब हो गई। वैसे तो ये समय, नई नई बाइक और कारों का था, परंतु मुझे आज भी अपनी साइकिल से अत्यंत प्रेम था। उसके चोरी हो जाने पर मुझे बहुत दुःख हुआ।
मैं सीधा नज़दीकी पुलिस थाने गया और अपनी शिकायत दर्ज करने को कहा। वहाँ सबने ऐसे मुझे देखा की जैसे कोई 15वीं सदी का व्यक्ति सीधा 21वीं सदी में आ गया हो। मैंने कहा, "आप मेरी शिकायत अभी दर्ज कीजिये और मेरी साइकिल ढूंढ कर लाइए"। शिकायत अधिकारी लगभग हंस ही दिया था, और कहा, "भाई साहब, यहाँ लोगो की महंगी-महंगी गाड़ियां और सामान चोरी हो जाता है, वो इतना आतुर नहीं होते, और एक आप है की एक मामूली सी साईकल के लिए पुरा थाना सिर पर उठाये ले रहे हैं"। अब मुझे गुस्सा आ गया और कहा, " ये बात आपके लिए मामूली होगी, लेकिन मेरे लिये नही"। अब उनको मेरी शिकायत दर्ज करनी ही पड़ी और साइकिल ढूढ़ने का भरोसा देकर उन्होंने मुझे विदा किया।
मुझे लग ही गया था, कि ये कुछ नही करने वाले, जो भी करना है, मुझे ही करना होगा। अब मैंने साइकिल खुद ही ढूढ़नी की ठानी। मानो, एक जासूस का दिमाग़ सक्रिय हो उठा। सब को मैंने शक़ की नज़र से देखना शुरू किया।
सबसे पहले हमारी कॉलोनी में जो कपड़े प्रेस किया करता था, उस पर मेरा शक़ गया । वो नशा किया करता था और उसे अक्सर पैसों की ज़रूरत रहा करती थी। मैंने कभी अतिरिक्त पैसे उसे नही दीये, कहीं ये ही तो नहीं। मैंने सख़्ती से पूछ-ताछ की तो वो रोने जैसा मुँह बनाते हुए बोला, "बाबूजी, हमने नही किया है। "
मेरा ध्यान अब अख़बार बांटने वाले पर गया, उसे तो साइकिल की ज़रूरत भी होती होगी, मैंने अख़बार बांटने वाले लड़के से भी पूछ-ताछ की और फिर उसे भी जाने दिया।
अब मेरा शक़, भूतल पर रहने वाले शर्मा जी पर भी गया। एक बार मैंने उन्हें पड़ोस के पेड़ से आम चुराते हुए देखा था, अगर वो इस उम्र में आम चुरा सकते हैं तो साइकिल क्यों नहीं ? मैंने उनसे सीधा तो नहीं पूछा, लेकिन पता किया की वो उस समय वो कार्यालय में थे या नहीं।
अब कौन हो सकता है। अब तक ये बात आग की तरह पुरी कॉलोनी में फैल गयी थी, की मैं अपनी चोरी हुई साइकिल की पूछ-ताछ कर रहा हूँ। अब मैंने सब्ज़ी वाले को रोका, वो बिना कुछ कहे ही बोल उठा, "हम नाही है चोर बाबू जी", और कहते हुए भाग गया। मेरे सामने से वर्मा जी जान बचाकर जाते हुए दिखे। मेन हैलो बोला तो वो खसियाने अंदाज़ में हंस दिये और तेजी से निकल गए।
अब तक मेरा भी जासूसी का भूत ऊतर गया था। मैंने दोबारा साइकिल नहीं खरीदी। बस से ही कार्यालय आना-जाना किया। मैंने भी सोच लिया था, साइकिल चोर को दुबारा मौका नहीं देना... क्यों ठीक किया ना...?


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